कॉरपोरेट का दिल अभी भी BJP पर—चंदा देख कांग्रेस बोले: “वाह रे राजनीति!”

गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही Electoral Bonds को अलविदा कह दिया हो, लेकिन कॉरपोरेट दान के मामले में तस्वीर वही पुरानी है— पैसा अभी भी उसी दरवाज़े पर जा रहा है, जहाँ पहले जाता था।

टाटा समूह के कंट्रोल वाला Progressive Electoral Trust (PET) इस साल फिर से सुर्खियों में है। 2024-25 में कुल 915 करोड़ रुपये के राजनीतिक चंदे में से लगभग 83% केवल BJP की झोली में पहुंचे। कांग्रेस को मिला सिर्फ 8.4%, और बाकी राशि क्षेत्रीय दलों में वितरित हो गई।

BJP को कॉरपोरेट प्यार—साल दर साल बढ़ता हुआ Curve

PET ने अकेले 757.6 करोड़ रुपये BJP को दिए। इसके साथ न्यू डेमोक्रेटिक, हार्मनी, ट्रॉयम्फ, जन कल्याण और आइंजिगार्टिग ट्रस्ट के दान मिलाकर BJP की कुल राशि और बढ़ गई।

मतलब चुनावी बॉन्ड हटे, फ्रेमवर्क बदला…लेकिन फंडिंग की दिशा नहीं।

2018-19 में भी PET ने सबसे ज्यादा पैसा BJP को दिया था। इतिहास खुद को दोहरा रहा है — बस जीएसटी की तरह, quietly।

कांग्रेस को मिला 77.3 करोड़: “Better luck next time” वाला vibe

कांग्रेस को PET से 77.3 करोड़, और बाकी न्यू डेमोक्रेटिक व जन कल्याण ट्रस्ट से थोड़ी-बहुत राशि मिली। हाँ, प्रूडेंट ट्रस्ट का डेटा अभी ECI साइट पर नहीं है— लेकिन पिछले साल की तरह “अचानक बरसते हुए 800+ करोड़” अब दिख नहीं रहे।

क्षेत्रीय दल: चंदे का Diet Version

TMC, YSRCP, शिवसेना, बीजद, डीएमके समेत कई दलों को 10-10 करोड़ मिले। कुछ दलों के लिए यह रकम उतनी ही है, जितनी पिछली बार की कॉफी बजट से जरूर ज्यादा कम है।

2024-25 में चंदा राशि देखकर साफ है— कॉरपोरेट इंडिया अभी भी “मुख्यधारा वाले Options” पर भरोसा जता रहा है।

टाटा समूह की कंपनियों ने सबसे ज्यादा दान किया

PET के पीछे टाटा समूह की पूरी आर्मी खड़ी दिखी — Tata Sons, TCS, Tata Steel, Tata Motors, Tata Power, Tata Communications, Tata Consumer Products, Tata Elxsi और Tata AutoComp।

महिंद्रा समूह का न्यू डेमोक्रेटिक ट्रस्ट भी लगभग पूरा दान BJP को देता दिखा। यानी Corporate India का एक ही Hidden Slogan दिखाई दिया— “Invest where ROI is predictable.”

चुनावी बॉन्ड बंद → सिस्टम बदला, Trend नहीं

सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने सिस्टम में transparency जरूर बढ़ाई, लेकिन Corporate Donations के flow में शायद ही कोई बड़ी tectonic shift आया हो।

डाटा कहता है— Political Finance अब भी उतनी ही एकतरफा है, जितनी पहले थी।

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